Tuesday, 11 August 2015

सोने की चिड़िया कभी

सोने की चिड़िया कभी, कहलाता था देश
आँधी आई लोभ की, सोना बचा न शेष। 
सोना बचा न शेष, पुनः अपनों ने लूटा। 
भरे विदेशी कोष, देश का ताला टूटा।
हुई इस तरह खूब, सफाई हर कोने की
ढूँढ रही अब डाल, लुटी चिड़िया सोने की।
------------------ 
जो रहते परदेस में, मन में बसता देश।
जोड़ा अंतर्जाल ने, दुविधा रही न शेष।
दुविधा रही न शेष, एक है कोना कोना
यही विश्व का मंच, यहीं सब साझा होना।
कहे कल्पनाहाल, दिलों का सुनते-कहते
मन में बसता देश, विदेशों में जो रहते।

-कल्पना रामानी  

No comments:

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

जंगल में मंगल

जंगल में मंगल

प्रेम की झील

प्रेम की झील