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Tuesday, 19 March 2013

फागुन के दिन चार



चलो सहेली बाग में, फागुन के दिन चार
ऋतु बसंत की आ गई, करके नव शृंगार।
करके नव शृंगार, केसरी आँचल ओढ़ा
लाए पुष्प गुलाल, ढाक भी रंग कटोरा
पर्व मनाया साथ, सभी ने होली खेली
फागुन के दिन चार, बाग में चलो सहेली   

होली आई झूमकर, चढ़ा रंग का रोग।
हर होटल हर माल पर, छाए छप्पन भोग।
छाए छप्पन भोग, घरों में कौन पकाए
निकल पड़े हैं साथ, सभी सड़कों पर छाए।
पकवानों के संग, भंग की खाकर गोली
घूम रहे  बेहाल, झूमकर आई होली।

होली ऐसी खेलिए, हो आनंद अभंग।
सद्भावों के रंग में, घुले प्रेम की भंग।
घुले प्रेम की भंग, भेद का भूत भगाएँ।
ऐसे मलें गुलाल, शत्रु भी मित्र कहाएँ।
रखकर होश हवास, कीजिये हँसी ठिठोली।
हो आनंद अभंग, खेलिए ऐसी होली।

कथा पुरातन काल की, हमें दिलाती याद।
जली होलिका, बच गए, ईश भक्त प्रहलाद।
ईश भक्त प्रहलाद, भक्ति से ताकत हारी
यही पर्व का सार, जानती दुनिया सारी।
भर लें हम भी स्वस्थ, रंग जीवन में नूतन।
भूलें कभी न मित्र, ‘कल्पना कथा पुरातन।

होली सिर पर चढ़ गई, खूब सखी इस बार
झूम रही पिचकारियाँ, घूम रही दीवार।
घूम रही दीवार, कदम हैं लगे थिरकने
गगन, सितारे, चाँद, लगे दिन में ही दिखने
कभी न खेले रंग, ‘कल्पना मैं थी भोली
मगर सखी इस बार, चढ़ गई सिर पर होली।

सुनी सुनाई बात है, होली इक लठमार।
नर पर भाँजे लाठियाँ, वृंदावन की नार।
वृंदावन की नार, यशोदा माँ बतलाते
नर कहलाते कृष्ण, सज़ा चोरी की पाते।
तब से ऐसी रीत, ‘कल्पना चलती आई
होली इक लठमार, बात है सुनी सुनाई।

इन्द्रधनुष से रंग हैं, बिखरे चारों ओर।
केसर और गुलाल के, बादल हैं पुरजोर।
बादल हैं पुरजोर, चली है पवन बसंती
लाई नवल प्रकाश, सखी, होली रसवंती।
मुक्त हुए मन-प्राण, ‘कल्पना द्वेष-कलुष से
बिखरे चारों ओर, रंग हैं इंद्र्धनुष से।

रचीं ऋचाएँ प्रेम की, रंगों ने हर पात।
सजी खड़ी है बाग में, फूलों की बारात।
फूलों की बारात, शगुन लाई पिचकारी
स्नेह मिलन को आज, उमड़ आए नर-नारी।
कहनी इतनी बात, इस तरह पर्व मनाएँ
ज्यों रंगों ने मीत, प्रीत की रचीं ऋचाएँ।

किया किनारा माघ ने, फागुन आया द्वार। 
लाया पुरवा प्रेम की, होली का त्यौहार।
होली का त्यौहार, कि मौसम यों कुछ महका
हर बगिया का फूल, रंग में घुलकर बहका।
गूँजे रसमय गीत, अहा! क्या खूब नज़ारा
फागुन आया द्वार, माघ ने किया किनारा।

पूनम की यह रात है, मौसम के सब रंग।
दहन हो रही होलिका, ढोल ढमाके संग।
ढोल ढमाके संग, घुली मस्ती जन-जन में
पूजा और प्रसाद, भरे पावनता मन में।
उत्सव की है धूम, न कोई छाया गम की
सब रंगों के साथ, रात आई पूनम की।
 
-कल्पना रामानी 

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--कल्पना रामानी

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