Wednesday, 18 July 2012

पंछी बाँधे नीड़







तिनका तिनका जोड़कर, पंछी बांधे नीड़।
पर मानव समझा नहीं, उस प्राणी की पीर।
उस प्राणी की पीर, स्वार्थ बस अपना भाया
डाली डाली चीर, पेड़ ही काट गिराया।
क्या देंगे वो धीर, ह्रदय ही खाली जिनका
पंछी की वो नीड़, हो गई तिनका तिनका।

फँसा परिंदा जाल में, सांसत में हैं प्राण।
कैसे बंधन मुक्त हो, मिले कैद से त्राण।
मिले कैद से त्राण, पुनः आज़ादी पाए
मुक्त सांस के साथ, गगन में उड़ उड़ जाए।
किससे करे गुहार, बना इंसान दरिंदा
सांसत में हैं प्राण, जाल में फँसा परिंदा।

पंछी तेरे पंख जो, पा जाऊँ इक बार।
उड़ूँ गगन को थामकर, सपने लिए हज़ार।
सपने लिए हज़ार, प्रेम की पाती धर लूँ
बाँचूँ उत उत सार, जहां भी दम पल भर लूँ।
गूंज उठे हर द्वार, स्नेह के सुर में बंसी
पा जाऊँ इक बार, पंख जो तेरे पंछी।

-कल्पना रामानी

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