Monday, 3 December 2012

शीतल रानी मैं तुम्हें...


शीतल रानी मैं तुम्हें, दूँगी अपना वोट।
जो अभाव से ग्रस्त हैं, करो न उनपर चोट।
करो न उनपर चोट, बड़े शहरों में जाओ
जो साधन सम्पन्न, उन्हीं से तुम बतियाओ।
दुखियों का दो साथ, करो मत आनाकानी
दूँगी अपना वोट, तुम्हें मैं शीतल रानी।
 
वहाँ न जाना शीत तुम, दीन बसे जिस ओर।
चिथड़ों में लिपटे हुए, काट रहे हों भोर।
काट रहे हों भोर, न कोई छप्पर सिर पर
फिरते नंगे पाँव, पेट ही भरना दूभर। 
बनना उनकी मीत, न उनको कभी सताना
दीन बसे जिस ओर, शीत तुम वहाँ न जाना।


-कल्पना रामानी  

No comments:

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

Google+ Followers

मेरी प्रकाशित ई बुक

जंगल में मंगल

जंगल में मंगल

प्रेम की झील

प्रेम की झील