Saturday, 24 November 2012

दस्तक से पलकें खुलीं




 
दस्तक से पलकें खुलीं,देखी सुंदर भोर।
शीत खड़ी थी सामने,कुहरा था पुरजोर।
कुहरा था पुरजोर, धुआँ ही धुआँ बिछा था।
भूगत होकर सूर्य, न जाने कहाँ छिपा था।
रहे ताकते राह, न आया दिनकर जब तक
देखी सुंदर भोर, हुई कुहरे की दस्तक।
 
शीत खड़ी है द्वार पर, धर कुहरे का ताज।
ऋतु रानी का आज से होगा एकल राज।
होगा एकल राज, व्यर्थ है छिपकर रहना
स्वागत करिए मीत, कल्पना का है कहना।
मिले पूर्व संकेत, सुखद यह बात बड़ी है
धर कुहरे का ताज, द्वार पर शीत खड़ी है।


-कल्पना रामानी

1 comment:

sharda monga (aroma) said...

शीत, व बदली सूर्य का, छुपा छिपी का खेल,
ठंड को धुन कर शीत ने कर दिया ढेलम ढेल.

कोहरे का लिहाफ ले, शीत गयी है सोय,
ओरों को ओढा दिया, गयी सपने में खोय.

पुनः पधारिए


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धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

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